ENTREPRENEUR SUCCESS STORY IN HINDI कैसे मैंने प्लास्टिक बिज़नेस से लाखो कमाए

बात उन दिनों की है जब मैं अपनी दसवीं की छुट्टियां मनाने गोवा गया हुआ था। ENTREPRENEUR SUCCESS STORY IN HINDI इससे पहले मैं कभी अपने शहर से भी बाहर नहीं गया था। ये ऊंची ऊंची बिल्डिन्गे, यह बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, इतनी भीड़, ट्रेने, ऐसा माहौल से में पहली बार परिचित हुआ था। गोवा में मामा जी के घर पहुंचते ही मैंने अपना सारा प्लान बना लिया क्योंकि मेरे पास केवल 20 दिन थे। और मैं लंबे समय से यह विचार कर रहा था कि मुझे गोवा जाना है। वहां घूमना है। वह जगह देखनी है। मैंने समुद्र कभी नहीं देखा तो मैंने बीच को सबसे ऊपर रखा। फिर 5 दिन बाद मामाजी मुझे एक स्मार्टफोन भी दिलवाने वाले थे। ये सारी उत्तेजनात्मक गतिविधियां मुझे सोने भी नहीं देती थी।

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मैं बड़ा ही उत्साहित था। अगली सुबह हुई और हम पूरे परिवार के साथ बीच पर घूमने के लिए निकल गए। हम पूरा दिन वही बिताने वाले थे क्योंकि हमको सन सेट भी देखना था। मुझे अकेला घूमना पसंद है तो मैं अकेला उनसे अलग थोड़ी देर के लिए घूमने निकल गया। मैं अपने छोटे से फोन से गाने सुन रहा था। मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि कब मैं बहुत दूर चला गया, और मैं ऐसी जगह पहुंच गया जहां गंदगी ही गंदगी थी. मुझे बड़ा ही गंदा सा इलाका लग रहा था कुछ लोग प्लास्टिक कचरे को बीन रहे थे। मैं वहां से दौड़ा चला आया। पर एक बात मेरे दिमाग में बैठ गई वह प्लास्टिक का कचरा।

स्मार्टफोन मिलते ही मैंने सबसे पहले प्लास्टिक प्रदूषण के बारे में पढ़ना शुरू किया। इसके आंकड़े, इसके नुकसान, पर्यावरण पर बूरे असर को पढ़कर मैं दंग रह गया। एक तरह से मैं भावुक हो गया। अगले दिन मैं वापस बीच पर जाने वाला था।
रास्ते में ही मैंने सोच लिया कि अबकी बार उस झुग्गी बस्ती के पास जाऊंगा और कुछ जानकारी पता करूंगा कि वह इस प्लास्टिक के कचरे का क्या करते हैं। मैं वहां गया तो वहां पर बहुत सारे लोग प्लास्टिक कचरे को बिन रहे थे। लेकिन पता नहीं क्यों वह पॉलीथिन और कुछ पैकेजिंग की थैलियों को छोड़ रहे थे। पूछने पर पता चला कि वह सस्ता बिकता है. और हमारा कांटेक्टर इसे नहीं खरीदता है। उनसे पूछने से मालूम पड़ा कि 5 रूपये किलो के भाव से प्लास्टिक बिकता हैं। मुझे कुछ कुछ समझ में आ रहा था, यह 5 रूपये किलो से बेचते हैं, कांटेक्टर आगे भेजता होगा, इसके आगे पता नहीं क्या होता होगा? अब मुझे यह पता करना था कि प्लास्टिक का आगे ले जाकर क्या करते होंगे ? मैंने प्लास्टिक के कांट्रेक्टर से बात करने की सोची ? दूसरे दिन कांट्रेक्टर के घर पहुंच गया। मेरा पहला सवाल ही यही था कि आप इन प्लास्टिक को कहां भेजते हो? तो वह बोला भाई यह फैक्ट्री में जाता है रीसायकल के लिए।
मैंने बोला रीसाइकिल के लिए! अरे भैया उधर से वापस दूसरा माल बनकर आता है।
मैं वापस लौट आया। रास्ते में मैं सोच रहा था रीसाइकिल के बारे में. रिसाइकल से अचानक मुझे विज्ञान का 18वा पाठ याद आ गया। उसमें 3R का फार्मूला था. और मुझे सारी चीजें समझ में आ गई थी। मुझे अब बस एक रीसाइकलिंग फैक्ट्री को देखना था. लेकिन मेरे 20 दिन पूरे हो गए और मुझे अपने प्रदेश लौटना था। कोई बात नहीं। मेरे पास फोन था, उसी पर देख लूंगा। यह सारा काम तो मैंने ट्रेन में ही निपटा लिया। मैं सब कुछ समझ गया कि कैसे प्लास्टिक रीसाइकलिंग बिजनेस शुरू करना है। कौन सी मशीनें चाहिए। क्या, कैसे, किस-तरह इन सब सवालों का जवाब मिल चुका था। मैंने यह भी देख लिया कि इस बिजनेस से कोई लाभ होता है या नहीं. मैं अपने इस काम से ज्यादा से ज्यादा कमाना चाहता था तो मैं अपने प्रत्येक कदम को सूझबूझ से उठाना चाहता था। बस एक दिक्कत थी पैसा। इस फैक्ट्री को लगाने के लिए चाहिए 2500000.
“हमारे मुख्य लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कुछ छोटे पड़ाव को भी पार करना पड़ता है।”

25 लाख 2500000 कहां से लाऊं, लोन ले लूँ, क्या करूं, कहीं डूब गये तो नहीं-नहीं, अभी कच्ची उम्र हैं। लोन नहीं, ऐसा करता हूं 2 साल इंतजार कर लेता हूं. तब तक 12वीं पास भी हो जाएगी और तब तक कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लूंगा। लेकिन मुझे कौन पार्ट टाइम जॉब देगा कोन ? मैंने कॉमर्स इसलिए चुनी थी क्योंकि मुझे बिजनेसमैन बनना था और मुझे सारे व्यवसाय प्रक्रम को समझना था. वह सब तो ठीक है लेकिन पार्ट टाइम के लिए क्या करूं?
यूट्यूब पर 10 दिन काम किया नहीं बना वेबसाइट ब्लॉग सभी जगह से ट्राई किया काम नहीं बना. सही बात बोले तो मेरे अंदर धैर्य नहीं था। मैं चाहता था कि 1 महीने में 100000 आए।
फाइनली मैंने 10 दसवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को पढ़ाना शुरू कर दिया। इस काम में भी मैंने जोखिम लिया. 8th 9th 10th तीनों कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया, और शुरू भी कर दिया। कुल मिलाकर 70 बच्चे मेरे पास आते थे। मैंने अपनी फीस 400 तय की थी।
400 से महीने के 28,000 पड़ेंगे। फिर सोचने वाली बात लेकिन इस काम को मैंने छोड़ा नहीं। कॉमर्स से मुझे शेयर मार्केट के बारे में पता चला। वहां से मुझे पैसा से पैसा कमाने का आईडिया मिल गया। जैसे तैसे करके मैंने अपना डिमैट अकाउंट खुलवाया और निवेश करना शुरू किया। मुझे पता था कि इंट्राडे ट्रेडिंग मुझसे संभव नहीं हो पाएगी. तो मैंने लंबे समय के लिए निवेश करना शुरू किया।
मैं महीने में 25000 निवेश करता था, 2 साल बीत गए। मैंने 12वी भी 59% से पास कर ली. मेरा बैंक बैलेंस अब तक 1000000 था। अब मुझे खुद पर विश्वास हो गया। मुझे विश्वास था कि मैं किसी भी घाटे को सहने के लिए तैयार हूं। मैंने बैंक से 2000000 का स्टार्टअप लोन ले लिया।
मैं चला गया वापस गोवा. मैंने किराया पर फैक्ट्री के लिए जगह ली. 2500000 की मशीनें लाया। 10 मजदूरों को बुक किया. कांट्रेक्टर का झंझट मिटा दिया। मैं सीधे ही झुग्गी वालों से प्लास्टिक खरीदता था।
मैं सॉलिड प्लास्टिक के साथ-साथ सॉफ्ट प्लास्टिक को भी खरीदता था क्योंकि मेरे लिए केवल यह एक बिजनेस नहीं था बल्कि मुझे पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देना था। 6 महीने बाद मैंने फैक्ट्री को 24 घंटों के लिए खोल दिया था। आठ आठ घंटों के तीन सेट में काम करवाता था। 1 घंटे में 100 किलो प्लास्टिक का रीसाइक्लिंग हो जाता था। औसतन 2000 किलो प्लास्टिक का रोजाना रीसाइकिल होता है मेरी फैक्ट्री में। 7 रूपये किलो के भाव से में 7*2000=14000 प्लास्टिक आता है. 21 मजदूर पूरे दिन में काम करते हैं 21*400= 8400

बिजली का खर्चा दिन का 2500 लगभग आता है और ट्रांसपोर्ट का खर्चा ज्यादा नहीं आता है। क्योंकि मेरी फैक्ट्री की लोकेशन पर आकर झुग्गी झोपड़ी वाले प्लास्टिक दे जाते हैं. तैयार माल को आगे पहुंचाने के लिए 3000 का खर्चा 2 दिन में एक बार आता है। मेरी फैक्ट्री का दिन का कुल खर्चा लगभग 26 हजार आता है।
तैयार माल दो प्रकार का होता है। एक सॉफ्ट स्क्रैप और दूसरा ब्लू स्क्रैप। सॉफ्ट स्क्रैप 30 रुपए किलो के भाव से और ब्लू स्क्रैप 45 किलो के भाव से बिकती हैं। दोनों का 1000 1000 किलो को लेकर चले तो 30000+450000 = 75हज़ार होता है। प्रतिदिन की कमाई लगभग 40 45 हजार हो जाती हैं। अभी मैं अपनी एक और फैक्टरी शुरू करने जा रहा हूं। प्लास्टिक के प्रोडक्ट बनाने की अभी मेरी उम्र 23 साल है।

यहाँ से सीखे https: प्लास्टिक रीसाइकलिंग बिजनेस कैसे करे : कम लागत ज्यादा मुनाफा

इस कहानी से आपने क्या सीखा ?
भाई जो भी यह बंदा था, उसने अपने लक्ष्य को लेकर धैर्य रखा था। उसने अपने गोल के प्रति ईमानदारी दिखाई। डिग्री के प्रतिशत इतने मायने नहीं रखते जितनी दुनियादारी की सूझबूझ ।

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अपना लक्ष्य एक रखो, और उस तक पहुंचने के लिए जितने भी पड़ाव पार करने पड़े, उसमें ईमानदारी दिखाओ.
आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब आप अपनी मंजिल पर पहुंच गए.
PRAVEEN KUMAR SIRVI

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